Friday, April 10, 2020

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मिर्ज़ा गालिब की शायरी
Mirza Galib Shayari

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mirza galib shayari

HINDI SHAYARI
MIRZA GALIB SHAYARI

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हजारों ख्वाहशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले 
बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले।

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हुई मुद्दत के गालिब मर गया
पर याद आती, जो हर बात पर कहना 
की यू होता तो क्या होता।

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इश्क़ पर जोर नहीं ये तो वो माचिस है
गालिब 
के लगाए ना लगे और बुझाए ना बुझे।

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उम्र भर हम भी गलती करते रहे गालिब 
धूप चेहरे पर थी और हम 

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हाथो की लकीर पर मत जा गालिब 
नसीब तो उसके भी होते है
जिनके हाथ नहीं होते। 

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ग़ैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहे यू तन्हा ए लब पैगाम के
खत लिखे गर्चे मतलब कुछ ना हो
हम तो आशिक़ है तुम्हारे नाम के 
इश्क़ ने गालिब निकम्मा कर दिया 
वरना हम भी आदमी थे काम के।

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चंद तस्वीरें ये बुता चंद हसीनो के खातूत
बाद मारने से मेरे घर से ये सामान निकला।

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किसी ने गालिब से पूछा कैसे हो
गालिब ने हसकर कहा 
"ज़िन्दगी में गम है
गम में दर्द है 
दर्द में मज़ा है
और मज़े में हम है"

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गुजर जायेंगे ये दौर भी गालिब 
जरा इत्मीनान तो रख
जब खुशी ना ठहरी तो हम की क्या औकात।

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मशरूफ रहने का अंदाज़ 
तुम्हे तहना ना करदे गालिब
रिश्ते फुरसत के नहीं 
तवज़जो के मोहताज होते हैं।

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माना कि ओरो के मुताबिक कुछ पाया नहीं हमने
पर खुद गिरता संभलता रहा किसी को गिराया नहीं हमने।
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मिर्ज़ा गालिब की मशहूर शायरी

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